-लक्ष्मी प्रसाद
चमोली: बैशाख का महीना शुरू होते ही चमोली जिले की पिंडर घाटी उमंग और उल्लास में डूब गयी है। ये मेले आज भी आपसी मेल-जोल का प्रतीक हैं। साथ ही पिंडर घाटी की पौराणिक परंपराओं को जीवंत करने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। ये मेले सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान तक ही सीमित नहीं होते, बल्कि ये यहां की परंपरा, संस्कृति, भाई-चारे एवं सामाजिक सौहार्द्र के प्रतीक भी हैं।
वीडियो: खुशाल सिंह नेगी
स्थानीय भाषा में इस मेले को बिखौती कहा जाता है। यह नाम वैशाख महीने से जुड़ा है। बैसाखी को गेहूं की बालियों में अनाज के आने की खुशी और देव डोलियों के संगम स्नान के रूप में मनाया जाता है। यहां देव डोलियों और निसाण के मिलन का दृश्य बेहद भावुक भी होता है।
पौराणिक संस्कृति के अनुरूप ढ़ोल- दमाऊं, भंकोर, वैद बजाकर निशानों का नृत्य कराया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में आसपास गाँव के लोग शिरकत करते हैं। भिटौली माह चैत्र के बाद बैशाख लगते ही उत्तराखंड की ध्याण बेटियां बैसाखी मेले में शिरकत करने अपने मायके आती हैं। पिछले वर्ष बैसाखी मेला कोरोना की भेंट चढ़ गया था।
वर्षो पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करते हुए इस बार भी चमोली पिंडर घाटी के पंती में विभिन्न गांवों से आयी माल से मालेश्वर महादेव, मींग से मींगेश्वर महादेव, कौब से कौबेश्वर महादेव, असेड से मृत्युंजय महादेव की डोलियां, निसाणों ने पिंडर में गंगा स्नान कर देव नृत्य किया, जिसमें आसपास के गांव के लोगों ने भारी संख्या में शिरकत की।

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